कौशांबी जिले का रोही बायपास आज एक सड़क नहीं, बल्कि एक खुला “मौत का गलियारा” बन चुका है। यहां रॉन्ग साइड ड्राइविंग कोई गलती नहीं, बल्कि एक सिस्टम-प्रोटेक्टेड अराजकता बनती जा रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब लोग लगातार मर रहे हैं, तो आखिर प्रशासन किस दुनिया में है? स्थानीय लोगों का साफ आरोप है कि इस मार्ग पर रॉन्ग साइड चलना अब “नॉर्मल” बन चुका है। दिन-रात वाहन उल्टी दिशा में दौड़ते हैं, और ट्रैफिक नियमों का मजाक उड़ाया जाता है। हादसे हो चुके हैं, जानें जा चुकी हैं, परिवार उजड़ चुके हैं लेकिन सिस्टम अभी भी आंख मूंदे बैठा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह स्थिति किसी से छिपी नहीं है। सोशल मीडिया पर मामला उठाया गया, वरिष्ठ पत्रकारों ने ट्वीट करके सीधे कौशांबी पुलिस को चेताया, जांच और कार्रवाई की मांग की गई। लेकिन नतीजा क्या निकला? वही पुरानी खामोशी जो अब लापरवाही नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से भागने जैसा व्यवहार लगने लगी है। आज जब फिर उसी मार्ग से पत्रकार अवनीश शर्मा गुजरे, तो दृश्य पहले से भी ज्यादा डरावना था लोग खुलेआम रॉन्ग साइड से फर्राटा भर रहे थे, जैसे सड़क उनकी निजी संपत्ति हो। कहीं कोई रोक नहीं, कहीं कोई डर नहीं, और सबसे खतरनाक कहीं कोई पुलिस नहीं। अब सवाल सीधा है क्या कोखराज पुलिस सो रही है? या फिर जानबूझकर आंखें मूंद रखी हैं? क्योंकि अगर पुलिस मौजूद है और फिर भी रॉन्ग साइड जारी है, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि सीधी नाकामी है। सूत्रों के मुताबिक पुलिस कप्तान स्तर से सख्ती के निर्देश भी दिए गए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन आदेशों का खुला मजाक उड़ा रही है। यह स्थिति साफ दिखाती है कि या तो आदेश फाइलों में दफन हो रहे हैं, या फिर नीचे स्तर पर उन्हें कोई गंभीरता से ले ही नहीं रहा। रोही बायपास पर ट्रैफिक व्यवस्था नाम की चीज खत्म हो चुकी है। न कोई बैरिकेडिंग प्रभावी है, न कोई नियमित चेकिंग, और न ही कोई ऐसा डर जो नियम तोड़ने वालों को रोक सके। यहां हर दिन नियमों की हत्या होती है, और सिस्टम बस पोस्टमार्टम रिपोर्ट बनने का इंतजार करता है। लोग अब सवाल नहीं, गुस्सा पूछ रहे हैं आखिर पुलिस करती क्या है? सिर्फ हादसे के बाद बयान देने के लिए या फिर “जांच जारी है” कहकर जिम्मेदारी खत्म करने के लिए? यह पूरा मामला अब एक साधारण ट्रैफिक समस्या नहीं रहा। यह प्रशासनिक सड़न की खुली तस्वीर बन चुका है, जहां आदेश और अमल के बीच एक गहरी खाई साफ दिखाई देती है। और इस खाई में हर दिन आम लोगों की जान गिर रही है। सबसे बड़ा कटाक्ष यही है कि जिस जगह पर लगातार मौतें हो रही हैं, वहां व्यवस्था का नाम तक महसूस नहीं होता। पुलिस की मौजूदगी अगर कागजों में है लेकिन सड़क पर नहीं, तो फिर उसका मतलब क्या रह जाता है?

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