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भारत और इज़रायल के रिश्तों की कहानी कई परतों से गुज़री है। आज भले ही दोनों देशों के बीच मजबूत सामरिक साझेदारी है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं थे। इसके बावजूद 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान घटनाक्रम ने ऐसा मोड़ लिया जिसने दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की राजनीति में नई दिशा तय कर दी।

1971 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर था और बांग्लादेश मुक्ति संग्राम निर्णायक चरण में पहुंच चुका था, तब नई दिल्ली को आधुनिक हथियारों और सैन्य साजो-सामान की तत्काल आवश्यकता थी। उस समय भारत के पास सोवियत संघ का समर्थन तो था, लेकिन कुछ विशेष प्रकार के सैन्य उपकरणों की कमी महसूस की जा रही थी। इसी पृष्ठभूमि में भारत ने चुपचाप इज़रायल से संपर्क साधा। उस दौर में भारत और Israel के बीच औपचारिक कूटनीतिक संबंध स्थापित नहीं हुए थे। भारत पारंपरिक रूप से फिलिस्तीन के समर्थन में रहा था और अरब देशों के साथ उसके ऊर्जा व रणनीतिक हित जुड़े थे। फिर भी राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए नई दिल्ली ने व्यावहारिक रुख अपनाया। एक चर्चित पुस्तक के अनुसार, भारत ने गोपनीय माध्यमों से तेल अवीव से हथियारों की मांग की, जिसे इज़रायल ने सकारात्मक रूप से लिया।

बताया जाता है कि उस समय पश्चिम एशिया में हालात जटिल थे। Iran और इज़रायल के बीच भी सामरिक समीकरण बदल रहे थे। इसी बीच पाकिस्तान ने यह आकलन किया कि इज़रायल क्षेत्रीय संकटों में उलझा रहेगा और भारत को त्वरित मदद नहीं मिल पाएगी। लेकिन घटनाक्रम पाकिस्तान के अनुमान के उलट गया। इज़रायल ने भारत को जरूरी सैन्य सामग्री उपलब्ध कराई, जिससे युद्ध की तैयारी में भारत को मजबूती मिली। दिसंबर 1971 में भारत और Pakistan के बीच युद्ध छिड़ गया। भारतीय सशस्त्र बलों ने पूर्वी मोर्चे पर तेज और निर्णायक अभियान चलाया। अंततः 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया और बांग्लादेश का गठन हुआ। इस पूरे संघर्ष के दौरान भारत को विभिन्न स्रोतों से जो समर्थन मिला, उसमें इज़रायल की गोपनीय सहायता भी एक महत्वपूर्ण पहलू माना जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रकरण भारत-इज़रायल संबंधों की बुनियाद मजबूत करने में एक अहम मोड़ था। भले ही सार्वजनिक रूप से दोनों देशों के बीच दूरी बनी रही, लेकिन रणनीतिक स्तर पर संवाद जारी रहा। बाद के दशकों में खुफिया सहयोग, रक्षा तकनीक और कृषि नवाचार जैसे क्षेत्रों में धीरे-धीरे संपर्क बढ़ता गया। आखिरकार 1992 में भारत और इज़रायल ने पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए। इसके बाद रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा। मिसाइल प्रणाली, ड्रोन तकनीक, निगरानी उपकरण और कृषि तकनीक जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच साझेदारी गहरी हुई। आज इज़रायल भारत के प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ताओं में गिना जाता है।

इस ऐतिहासिक घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल वैचारिक आधार पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक जरूरतों और रणनीतिक हितों पर भी टिके होते हैं। 1971 का वह अध्याय दर्शाता है कि कठिन परिस्थितियों में लिए गए गोपनीय और साहसिक फैसले भविष्य की साझेदारियों की नींव रख सकते हैं। आज जब पश्चिम एशिया में फिर से अस्थिरता के संकेत दिखाई देते हैं, तब 1971 की यह कहानी याद दिलाती है कि कूटनीति में स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते, स्थायी होते हैं तो केवल राष्ट्रीय हित। भारत और इज़रायल के संबंधों का विकास इसी यथार्थवादी दृष्टिकोण का परिणाम है, जिसने समय के साथ दोनों देशों को रणनीतिक साझेदार बना दिया।

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