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मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि क्या अमेरिका ने कभी पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों या उसकी जमीन का इस्तेमाल ईरान में जासूसी गतिविधियों के लिए किया है। यह सवाल इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि अमेरिका और ईरान के रिश्ते लंबे समय से बेहद तनावपूर्ण रहे हैं, वहीं पाकिस्तान अमेरिका का रणनीतिक साझेदार भी रहा है।

हालांकि अब तक इस बात की कोई आधिकारिक पुष्टि या सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं आया है कि अमेरिका ने सीधे तौर पर पाकिस्तान के किसी सैन्य बेस का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ जासूसी के लिए किया हो, लेकिन रणनीतिक जानकारों और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के बीच इस मुद्दे पर लंबे समय से चर्चाएं होती रही हैं।

पाकिस्तान की भौगोलिक अहमियत

पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति इस पूरे विवाद का केंद्र मानी जाती है। पाकिस्तान एक ऐसा देश है जिसकी सीमाएं ईरान, अफगानिस्तान, चीन और भारत से मिलती हैं। ईरान से सटी लंबी सीमा होने के कारण पाकिस्तान रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील क्षेत्र में आता है। यही वजह है कि शीत युद्ध के बाद और खासकर 9/11 के बाद अमेरिका की पाकिस्तान में सैन्य और खुफिया मौजूदगी बढ़ी।

2001 के बाद आतंकवाद के खिलाफ जंग के नाम पर अमेरिका ने पाकिस्तान में लॉजिस्टिक सपोर्ट, खुफिया सहयोग और कुछ समय के लिए एयरबेस तक पहुंच बनाई थी। उस दौर में ड्रोन ऑपरेशन, खुफिया नेटवर्क और तकनीकी निगरानी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। इसी पृष्ठभूमि में यह आशंका जताई जाती है कि अमेरिका ने क्षेत्रीय निगरानी के दौरान ईरान पर भी नजर रखी होगी।

ईरान के आरोप और शंकाएं

ईरान पहले भी कई बार यह आरोप लगाता रहा है कि अमेरिका उसके परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल ठिकानों और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की गतिविधियों पर जासूसी करता है। ईरान का मानना है कि अमेरिका पड़ोसी देशों में मौजूद अपने सहयोगियों और तकनीकी संसाधनों का इस्तेमाल कर उसकी सुरक्षा से जुड़ी जानकारियां जुटाता है।

हालांकि ईरान ने सीधे तौर पर यह साबित करने वाला कोई ठोस सबूत सार्वजनिक नहीं किया है कि पाकिस्तान की जमीन से अमेरिकी जासूसी अभियान चलाए गए हों, लेकिन क्षेत्रीय राजनीति में संदेह और अविश्वास का माहौल बना रहता है।

पाकिस्तान का आधिकारिक रुख

पाकिस्तान की सरकार और सेना ऐसे आरोपों को सिरे से खारिज करती रही है। इस्लामाबाद का स्पष्ट कहना है कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल किसी भी पड़ोसी देश के खिलाफ नहीं होने देता। पाकिस्तान कई बार यह दोहरा चुका है कि उसकी विदेश नीति क्षेत्रीय स्थिरता और अच्छे पड़ोसी संबंधों पर आधारित है, खासकर ईरान के साथ।

पाकिस्तान यह भी कहता रहा है कि अमेरिका के साथ उसका सैन्य सहयोग आतंकवाद के खिलाफ सीमित था और किसी तीसरे देश को निशाना बनाने के लिए नहीं था।

आधुनिक जासूसी की नई तकनीक

विशेषज्ञों का कहना है कि आज के दौर में जासूसी सिर्फ सैन्य बेस या सैनिकों की तैनाती तक सीमित नहीं रह गई है। आधुनिक तकनीक के जरिए

  • सैटेलाइट निगरानी
  • साइबर इंटेलिजेंस
  • इलेक्ट्रॉनिक इंटरसेप्शन
  • हाई-एल्टीट्यूड ड्रोन
    जैसे साधनों से किसी भी देश की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है।

ऐसे में यह जरूरी नहीं कि ईरान की निगरानी के लिए अमेरिका को पाकिस्तान में किसी स्थायी सैन्य बेस की जरूरत पड़े।

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