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मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच एक नई और गंभीर चिंता सामने आई है। खबरों के मुताबिक ईरान ने इजरायल के डिमोना परमाणु रिएक्टर को निशाना बनाने की चेतावनी दी है। यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब क्षेत्र पहले से ही युद्ध जैसे हालात से गुजर रहा है। इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है कि अगर परमाणु रिएक्टर पर हमला हुआ तो उसका असर सिर्फ इजरायल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र को गंभीर खतरे में डाल सकता है। इजरायल का डिमोना परमाणु केंद्र नेगेव रेगिस्तान में स्थित है और इसे देश की परमाणु क्षमता से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान माना जाता है। वर्षों से यह माना जाता रहा है कि इसी केंद्र से इजरायल की परमाणु नीति और सैन्य शक्ति जुड़ी हुई है। हालांकि इजरायल आधिकारिक तौर पर अपने परमाणु हथियारों की मौजूदगी को न तो स्वीकार करता है और न ही पूरी तरह से खारिज करता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ लंबे समय से इसे एक प्रमुख परमाणु सुविधा मानते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसी मिसाइल या ड्रोन हमले में डिमोना रिएक्टर को गंभीर नुकसान पहुंचता है, तो स्थिति बेहद खतरनाक हो सकती है। हालांकि ऐसा हमला परमाणु बम के विस्फोट जैसा नहीं होगा, लेकिन इससे रेडियोएक्टिव मटेरियल के फैलने का खतरा पैदा हो सकता है। अगर ऐसा हुआ तो आसपास के इलाकों में लंबे समय तक विकिरण का असर बना रह सकता है, जिससे मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण और कृषि पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। परमाणु विशेषज्ञों के मुताबिक अगर रेडियोएक्टिव पदार्थ वातावरण में फैलता है, तो उसका असर हवा और मौसम के रुख के अनुसार कई देशों तक पहुंच सकता है। इसका मतलब यह है कि संभावित संकट सिर्फ इजरायल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पड़ोसी खाड़ी देशों और पूरे मिडिल ईस्ट क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है। ऐसे हालात में बड़े पैमाने पर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने, स्वास्थ्य आपातकाल और पर्यावरणीय संकट जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।

दुनिया पहले भी परमाणु दुर्घटनाओं के गंभीर परिणाम देख चुकी है। यूक्रेन का चेरनोबिल हादसा और जापान का फुकुशिमा संकट यह दिखा चुके हैं कि किसी परमाणु प्रतिष्ठान में गंभीर क्षति होने पर उसका असर दशकों तक बना रह सकता है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय समुदाय परमाणु प्रतिष्ठानों को युद्ध से दूर रखने की लगातार अपील करता रहा है। मिडिल ईस्ट पहले से ही भू-राजनीतिक तनाव का केंद्र रहा है और यहां किसी भी बड़े सैन्य कदम का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा सभी इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। ऐसे में अगर परमाणु प्रतिष्ठान पर हमला होता है, तो इसका असर वैश्विक स्तर पर भी देखने को मिल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में सभी पक्षों को संयम बरतने और कूटनीतिक रास्ते तलाशने की जरूरत है। परमाणु प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय कानून और मानव सुरक्षा के लिहाज से बेहद खतरनाक कदम माना जाता है। फिलहाल दुनिया की नजरें मिडिल ईस्ट के घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं। यह देखना अहम होगा कि तनाव आगे किस दिशा में जाता है और क्या क्षेत्र के देश किसी बड़े संकट से बचने के लिए बातचीत का रास्ता अपनाते हैं या नहीं।

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