Image Source STILL FROM DHURANDHAR THE REVENGE (1)

फिल्म ‘धुरंधर-2’ इन दिनों बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त प्रदर्शन कर रही है, लेकिन इसकी सफलता के साथ-साथ अब यह राजनीतिक विवादों के केंद्र में भी आ गई है। खासतौर पर फिल्म में दिखाए गए ‘आतिफ अहमद’ नाम के किरदार को लेकर सियासत गरमा गई है। समाजवादी पार्टी (सपा), कांग्रेस और एआईएमआईएम जैसे दलों ने इस किरदार की प्रस्तुति पर सवाल उठाते हुए इसे एक खास समुदाय को टारगेट करने की कोशिश बताया है।

राजनीतिक दलों का आरोप है कि फिल्म में ‘आतिफ अहमद’ का चित्रण जिस तरीके से किया गया है, वह समाज में एक विशेष वर्ग की नकारात्मक छवि पेश करता है। सपा के नेताओं का कहना है कि सिनेमा एक शक्तिशाली माध्यम है, और इसके जरिए किसी भी समुदाय या वर्ग को गलत तरीके से दिखाना समाज में विभाजन पैदा कर सकता है। वहीं एआईएमआईएम ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि फिल्मों में इस तरह के किरदारों के जरिए नफरत फैलाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। कांग्रेस ने भी इस विवाद में अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि फिल्म निर्माताओं को सामाजिक जिम्मेदारी का ध्यान रखना चाहिए। पार्टी के कुछ नेताओं ने सेंसर बोर्ड की भूमिका पर भी सवाल उठाए और पूछा कि क्या इस तरह के संवेदनशील कंटेंट को बिना पर्याप्त समीक्षा के मंजूरी दी जानी चाहिए। उनका मानना है कि मनोरंजन के नाम पर समाज में गलत संदेश देना उचित नहीं है।

दूसरी ओर, फिल्म के निर्माताओं और समर्थकों का कहना है कि ‘धुरंधर-2’ एक काल्पनिक कहानी पर आधारित है और इसका किसी वास्तविक व्यक्ति या समुदाय से कोई संबंध नहीं है। उनका तर्क है कि फिल्म को केवल एक एंटरटेनमेंट प्रोडक्ट के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि राजनीतिक चश्मे से। निर्माताओं का यह भी कहना है कि इस तरह के विवाद अक्सर फिल्मों की लोकप्रियता बढ़ाने का काम करते हैं। फिल्म इंडस्ट्री के कुछ जानकारों का मानना है कि यह विवाद कहीं न कहीं फिल्म की बढ़ती लोकप्रियता का ही परिणाम है। जैसे-जैसे फिल्म दर्शकों के बीच चर्चा में आती है, वैसे-वैसे उस पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो जाती हैं। हालांकि, यह भी सच है कि आज के दौर में कंटेंट को लेकर संवेदनशीलता बढ़ गई है और किसी भी किरदार या संवाद को लेकर विवाद खड़ा हो सकता है।

इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि फिल्मों की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। क्या फिल्मकारों को पूरी आजादी होनी चाहिए या उन्हें समाज के विभिन्न वर्गों की भावनाओं का भी ध्यान रखना चाहिए? यह सवाल लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है और ‘धुरंधर-2’ का विवाद इसे फिर से सुर्खियों में ले आया है। फिलहाल, ‘धुरंधर-2’ को लेकर जारी यह सियासी घमासान थमने के आसार नहीं दिख रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह विवाद फिल्म के कारोबार को प्रभावित करता है या फिर यह चर्चा फिल्म को और ज्यादा लोकप्रिय बना देती है। एक बात साफ है कि मनोरंजन और राजनीति का यह टकराव आने वाले समय में भी ऐसे ही मुद्दों को जन्म देता रहेगा।

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