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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि कोई भी अदालत किसी महिला, खासकर नाबालिग को, बिना उसकी मर्जी के मां बनने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। इस फैसले के तहत कोर्ट ने 30 हफ्ते की गर्भवती नाबालिग लड़की को गर्भपात की अनुमति दी।

जस्टिस बीवी नागरत्ना की अगुवाई वाली बेंच ने स्पष्ट किया कि नाबालिग की प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) का सम्मान किया जाना चाहिए, खासकर तब जब उसने गर्भावस्था जारी न रखने की इच्छा जताई हो।

कोर्ट ने आदेश में कहा कि लड़की को गर्भावस्था जारी रखने का अधिकार है, लेकिन वर्तमान स्थिति में गर्भावस्था अवैध है क्योंकि वह नाबालिग है। बेंच ने यह भी साफ किया कि इस मामले में यह देखना जरूरी नहीं कि संबंध सहमति से हुआ था या यौन उत्पीड़न का नतीजा। नाबालिग होने के कारण गर्भावस्था अवैध मानी जाती है, और जन्म होने वाला बच्चा कानूनी रूप से वैध नहीं होगा।

कोर्ट ने मुंबई के जे.जे. अस्पताल को निर्देश दिया कि मेडिकल प्रोटोकॉल का पालन करते हुए नाबालिग की गर्भावस्था का सुरक्षित टर्मिनेशन किया जाए।

क्या है मौजूदा कानून और सुप्रीम कोर्ट का पिछला रुख?

केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2021 में प्रेग्नेंसी खत्म करने के कानून में बदलाव करते हुए मियाद 20 हफ्ते से बढ़ाकर 24 हफ्ते कर दी थी। इसके तहत विशेष परिस्थितियों में, जैसे रेप पीड़ित, नाबालिग या शादी का स्टेटस बदलने की स्थिति में, प्रेग्नेंसी को 24 हफ्ते तक सुरक्षित तरीके से खत्म किया जा सकता है।

20 हफ्ते तक: किसी भी महिला की प्रेग्नेंसी को बिना किसी शर्त के खत्म किया जा सकता है।

20–24 हफ्ते: केवल जब महिला के जीवन पर खतरा हो, गंभीर शारीरिक या मानसिक चोट का जोखिम हो, बच्चे में गंभीर विकृति हो, या महिला रेप या नाबालिग हो।

सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया कि अविवाहित महिलाओं को भी गर्भपात का अधिकार है। कानून में विवाहित और अविवाहित महिलाओं में भेदभाव नहीं किया जा सकता। अब मैरिटल रेप के मामलों में भी महिला को 24 हफ्ते तक प्रेग्नेंसी खत्म करने का अधिकार है।

30 हफ्ते तक गर्भपात की अनुमति, नया महत्व

इस ताजा फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 30 हफ्ते की गर्भवती नाबालिग को भी गर्भपात की अनुमति दी। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि नाबालिग की अनिच्छा के बाद उसे मां बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इसे विशेषज्ञ और अधिकार कार्यकर्ताओं ने प्रजनन अधिकारों की दिशा में बड़ा कदम माना है।

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