संवाददाता- संजय खान

प्रयागराज से समाजवादी पार्टी (सपा) की विधायक विजमा यादव को 21 साल पुराने आपराधिक मामले में बड़ी कानूनी राहत मिली है। एमपी-एमएलए कोर्ट ने आगजनी और लूटपाट के आरोपों से जुड़े इस लंबे समय से लंबित मामले में साक्ष्यों के अभाव में विजमा यादव समेत अन्य आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत के इस फैसले के साथ ही दो दशक से अधिक समय से चल रही कानूनी जद्दोजहद का अंत हो गया।

यह मामला वर्ष 2005 का है, जब विजमा यादव समेत कुछ अन्य लोगों पर आगजनी और लूटपाट का आरोप लगाया गया था। शिकायतकर्ता शशि देवी की ओर से संबंधित थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया था। आरोप गंभीर थे और मामला न्यायालय में विचाराधीन रहा। समय के साथ इस केस में कई तारीखें पड़ीं, गवाह पेश हुए और दस्तावेजी साक्ष्यों की जांच की गई।

एमपी-एमएलए कोर्ट में चली सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष को आरोप साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करने थे। हालांकि, अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहियों का परीक्षण करने के बाद पाया कि आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। इसी आधार पर अदालत ने विजमा यादव और अन्य सह-आरोपियों को बरी करने का आदेश दिया।

अदालत के फैसले के बाद विजमा यादव के समर्थकों में खुशी का माहौल देखा गया। राजनीतिक गलियारों में भी इस निर्णय को लेकर चर्चा तेज हो गई है। विजमा यादव वर्तमान में प्रयागराज के प्रतापपुर विधानसभा क्षेत्र से सपा की विधायक हैं और क्षेत्रीय राजनीति में उनका प्रभाव माना जाता है। लंबे समय से चल रहे इस मुकदमे का राजनीतिक और व्यक्तिगत दोनों स्तरों पर असर रहा।

कानूनी जानकारों का कहना है कि किसी भी आपराधिक मामले में दोषसिद्धि के लिए साक्ष्यों का मजबूत होना आवश्यक होता है। यदि अभियोजन पक्ष आरोपों को ठोस प्रमाणों के साथ साबित नहीं कर पाता, तो अदालत आरोपी को बरी करने के लिए बाध्य होती है। इस मामले में भी अदालत ने साक्ष्यों के अभाव को आधार बनाया।

वहीं, विपक्षी दलों की ओर से इस फैसले पर अभी तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी हो सकती है। 21 साल तक चले इस मामले का फैसला ऐसे समय में आया है जब प्रदेश की राजनीति पहले से ही कई मुद्दों को लेकर गरमाई हुई है।

फिलहाल, एमपी-एमएलए कोर्ट के इस निर्णय ने विजमा यादव को बड़ी राहत दी है। दो दशक से अधिक समय तक चले मुकदमे के बाद बरी होने से उनके राजनीतिक भविष्य पर लगे कानूनी साए को भी राहत मिली है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस फैसले के खिलाफ उच्च अदालत में कोई अपील दायर की जाती है या मामला यहीं समाप्त हो जाता है।

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