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यूपी ब्यूरो, नितिन अग्रहरि

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाती रही है, लेकिन इस बार मामला सिर्फ विपक्ष की रणनीति तक सीमित नहीं है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के भीतर उभरती लोध बनाम कुर्मी की सियासी खींचतान अब पार्टी के लिए सिरदर्द बनती जा रही है। हालिया घटनाक्रम में मंत्री स्वतंत्र देव सिंह और बीजेपी विधायक बृजभूषण सिंह राजपूत के बीच शुरू हुआ विवाद धीरे-धीरे दो प्रभावशाली पिछड़ी जातियों की लड़ाई में तब्दील होता दिख रहा है।

कैसे शुरू हुआ विवाद?

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि संगठन और सरकार के स्तर पर फैसलों, नियुक्तियों और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर दोनों नेताओं के बीच तनातनी लंबे समय से चल रही थी। हाल के बयानों और आरोप-प्रत्यारोप ने इस अंदरूनी खींचतान को सार्वजनिक कर दिया। यही वह मोड़ था, जहां व्यक्तिगत या राजनीतिक मतभेद कुर्मी बनाम लोध की जातीय बहस में बदलने लगे।

कुर्मी और लोध: बीजेपी की ताकत

यूपी की राजनीति में कुर्मी और लोध समुदाय का बड़ा वोट बैंक माना जाता है। कुर्मी समाज को पारंपरिक रूप से बीजेपी के मजबूत आधारों में गिना जाता रहा है, वहीं लोध समुदाय का झुकाव भी लंबे समय से पार्टी की ओर रहा है। खासतौर पर ग्रामीण और अर्ध-ग्रामीण इलाकों में इन दोनों जातियों का प्रभाव चुनावी नतीजों को सीधे प्रभावित करता है।

बीजेपी की सफलता की बड़ी वजह यही रही है कि उसने इन जातियों को साथ लेकर सामाजिक संतुलन साधा। लेकिन अब अगर पार्टी के भीतर ही इन समुदायों के बीच टकराव की धारणा मजबूत होती है, तो इसका सीधा असर जमीनी स्तर पर पड़ सकता है।

संगठन बनाम सरकार की लड़ाई?

विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद सिर्फ दो नेताओं का नहीं, बल्कि संगठन और सरकार के बीच शक्ति संतुलन का भी संकेत देता है। जब ऐसे मतभेद जातीय रंग ले लेते हैं, तो पार्टी के लिए उन्हें संभालना और मुश्किल हो जाता है। कार्यकर्ता और समर्थक भी जाति के आधार पर खेमों में बंटने लगते हैं, जिससे चुनावी एकजुटता कमजोर पड़ती है।

विपक्ष को मिला मौका

बीजेपी के अंदर चल रही इस खींचतान पर विपक्ष की नजरें टिकी हुई हैं। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे दल पहले से ही बीजेपी पर कास्ट पॉलिटिक्स का आरोप लगाते रहे हैं। अब अगर कुर्मी बनाम लोध की लड़ाई और गहराती है, तो विपक्ष इसे जमीनी मुद्दा बनाकर बीजेपी को घेर सकता है।

सत्ता की हैट्रिक पर असर?

बीजेपी यूपी में लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की तैयारी कर रही है, लेकिन राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अंदरूनी कलह और जातीय असंतुलन पार्टी की राह मुश्किल कर सकता है। अगर कुर्मी और लोध समाज के बीच असंतोष बढ़ा, तो इसका असर दर्जनों सीटों पर देखने को मिल सकता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां इन जातियों का सीधा दबदबा है।

हाईकमान की अग्निपरीक्षा

अब सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के सामने है। पार्टी को जल्द ही यह साफ करना होगा कि वह इस विवाद को कैसे सुलझाती है। क्या दोनों समुदायों को संतुलित संदेश दिया जाएगा? या फिर संगठनात्मक फेरबदल और राजनीतिक संवाद के जरिए आग को ठंडा किया जाएगा? यही फैसले आने वाले चुनावों की दिशा तय करेंगे।

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