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मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच एक ऐसा देश है जो सीधे युद्ध का पक्षकार नहीं होते हुए भी सबसे ज्यादा दबाव झेल रहा है, वह है Iraq। Iran और United States के बीच चल रहे टकराव ने इराक को लगभग क्रॉसफायर की स्थिति में ला खड़ा किया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि इराकी जमीन पर दोनों पक्षों से हमले हो रहे हैं। ईरान समर्थित मिलिशिया अमेरिकी ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइल से हमला कर रहे हैं, जबकि अमेरिका जवाबी कार्रवाई में उन्हीं मिलिशिया के ठिकानों को निशाना बना रहा है।

इराक क्यों बना संघर्ष का मैदान

इराक की भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति इस पूरे संकट का सबसे बड़ा कारण है। एक ओर देश में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी है, जो आतंकवाद विरोधी अभियानों के नाम पर बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर कई शक्तिशाली शिया मिलिशिया समूह हैं जिनका झुकाव ईरान की ओर माना जाता है। इन्हीं मिलिशिया समूहों में सबसे प्रभावशाली नेटवर्क Popular Mobilization Forces है, जिसके कई धड़े ईरान समर्थित माने जाते हैं।

जैसे ही क्षेत्र में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ता है, इन मिलिशिया समूहों की गतिविधियां तेज हो जाती हैं। वे अक्सर इराक में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हैं। हाल के दिनों में ड्रोन और रॉकेट हमलों की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। जवाब में अमेरिका भी सख्त सैन्य प्रतिक्रिया देता है और मिलिशिया के ठिकानों पर एयरस्ट्राइक करता है। इस तरह इराक की धरती एक बार फिर बाहरी शक्तियों के संघर्ष का मैदान बन गई है।

अमेरिकी ठिकानों पर हमले

इराक में कई अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। इनमें से एक प्रमुख बेस Al Asad Airbase है, जहां पहले भी कई बार रॉकेट और ड्रोन हमले हो चुके हैं। हालिया घटनाओं में ईरान समर्थित समूहों ने अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाकर कई हमले किए। इन हमलों का उद्देश्य अमेरिका पर दबाव बनाना और क्षेत्र में उसकी सैन्य मौजूदगी को चुनौती देना बताया जा रहा है।

इन हमलों के बाद अमेरिका ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए कई मिलिशिया ठिकानों को निशाना बनाया। अमेरिकी एयरस्ट्राइक में हथियार डिपो, प्रशिक्षण केंद्र और कमांड पोस्ट को नष्ट करने का दावा किया गया है। हालांकि इन हमलों के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है।

तेल निर्यात पर असर

इराक की अर्थव्यवस्था काफी हद तक तेल निर्यात पर निर्भर है। देश की सरकारी आय का बड़ा हिस्सा तेल से आता है। लेकिन मौजूदा सुरक्षा संकट ने तेल उद्योग को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है। अगर हमले बढ़ते हैं या तेल उत्पादन और निर्यात के बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचता है, तो इसका सीधा असर इराक की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि तेल निर्यात में थोड़ी सी भी बाधा इराक के बजट, विकास योजनाओं और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा विदेशी निवेशक भी अस्थिरता के कारण देश से दूरी बना सकते हैं।

राजनीतिक अस्थिरता का खतरा

इराक पहले से ही राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। सरकार को अक्सर विभिन्न राजनीतिक गुटों और मिलिशिया समूहों के बीच संतुलन बनाकर चलना पड़ता है। ऐसे में जब देश की जमीन पर अमेरिका और ईरान के बीच परोक्ष संघर्ष शुरू हो जाता है, तो सरकार के लिए स्थिति संभालना और भी मुश्किल हो जाता है।

इराकी नेतृत्व लगातार यह कोशिश कर रहा है कि देश किसी बड़े क्षेत्रीय युद्ध का हिस्सा न बने। लेकिन वास्तविकता यह है कि जब विदेशी सेनाएं और प्रभावशाली मिलिशिया दोनों सक्रिय हों, तो सरकार की शक्ति सीमित हो जाती है।

आम नागरिकों पर असर

इस पूरे संघर्ष का सबसे बड़ा असर आम नागरिकों पर पड़ रहा है। लोगों में सुरक्षा को लेकर डर बढ़ रहा है। कई क्षेत्रों में रॉकेट हमलों और सैन्य गतिविधियों के कारण सामान्य जीवन प्रभावित हो रहा है। व्यापार, निवेश और रोजमर्रा की गतिविधियां भी इस अनिश्चित माहौल से प्रभावित हो रही हैं।

आगे क्या

विश्लेषकों का मानना है कि यदि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम नहीं हुआ, तो इराक में यह परोक्ष युद्ध और तेज हो सकता है। ऐसी स्थिति में इराक को एक बार फिर उस दौर का सामना करना पड़ सकता है जब देश की जमीन पर बाहरी शक्तियों के टकराव ने लंबे समय तक अस्थिरता पैदा की थी। फिलहाल इराक की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह खुद को इस संघर्ष से दूर रखे और अपने देश को एक और बड़े संकट से बचा सके। लेकिन मौजूदा हालात बताते हैं कि मिडिल ईस्ट की इस भू-राजनीतिक शतरंज में इराक अभी भी सबसे संवेदनशील मोहरे की तरह खड़ा है।

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