Credit: SORA AI

कौशांबी जिले में इन दिनों हालात ऐसे बनते दिखाई दे रहे हैं, जहां सच लिखने और दिखाने वालों की आवाज धीरे-धीरे दबाई जा रही है। पत्रकारिता, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, वही अब दबाव, धमकी और साजिशों के बीच घिरती नजर आ रही है। जिले में लगातार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां पत्रकारों को निशाना बनाकर उनकी आवाज को कुचलने की कोशिश की जा रही है। कुछ ऐसे लोग, जो कथित तौर पर नेताओं के टुकड़ों पर पल रहे हैं, वे सच्चाई सामने लाने वाले पत्रकारों को डराने और झूठे मामलों में फंसाने का काम कर रहे हैं। यह स्थिति सिर्फ एक व्यक्ति या एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे जिले में पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

लोकतंत्र में पत्रकार का काम सत्ता और प्रशासन से सवाल पूछना होता है, लेकिन कौशांबी में तस्वीर उलट दिखाई दे रही है। यहां सच दिखाने वाले पत्रकारों को ही कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। कई पत्रकारों का आरोप है कि जब भी वे किसी गलत काम या भ्रष्टाचार को उजागर करने की कोशिश करते हैं, तब उनके खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज करने या दबाव बनाने की रणनीति अपनाई जाती है। इससे साफ संकेत मिलता है कि कुछ ताकतें सच को सामने आने से रोकना चाहती हैं। पत्रकारों का कहना है कि अगर यही हालात रहे तो जिले में स्वतंत्र पत्रकारिता लगभग खत्म हो जाएगी और जनता तक सही जानकारी पहुंचाना मुश्किल हो जाएगा।

इसी क्रम में पत्रकार इश्तियाक अहमद का मामला पूरे जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है। आरोप लगाया गया कि इश्तियाक अहमद एक मारपीट की घटना में शामिल थे और इसी आधार पर उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। लेकिन इस पूरे मामले में कई ऐसे सवाल उठ रहे हैं, जो पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर संदेह पैदा करते हैं। पत्रकार संगठनों और स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस समय मारपीट की घटना बताई जा रही है, उस समय इश्तियाक अहमद एक शादी समारोह में मौजूद थे। इतना ही नहीं, उनके शादी समारोह में भोजन करते हुए फोटो भी सामने आई है, जिससे पुलिस की कहानी पर सवाल खड़े हो गए हैं।

पत्रकारों का आरोप है कि पुलिस ने बिना निष्पक्ष जांच किए और तथ्यों की सही पुष्टि किए बिना जल्दबाजी में कार्रवाई की। उनका कहना है कि अगर पुलिस निष्पक्ष जांच करती तो सच्चाई सामने आ जाती और एक पत्रकार को झूठे आरोपों में जेल नहीं जाना पड़ता। इस मामले को लेकर पत्रकारों में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है। उनका कहना है कि यह सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे पत्रकार समाज को डराने और दबाने की कोशिश है।

स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि पुलिस पर कथित रूप से कुछ प्रभावशाली लोगों का दबाव था, जिसके कारण यह कार्रवाई की गई। पत्रकारों का आरोप है कि जिले में कई बार ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां सच्चाई उजागर करने वाले पत्रकारों को निशाना बनाया गया। उनका कहना है कि अगर इस तरह की घटनाएं जारी रहीं तो पत्रकार खुलकर काम नहीं कर पाएंगे और जनता तक सच्चाई पहुंचाना मुश्किल हो जाएगा।

पत्रकार संगठनों ने यह भी कहा कि पत्रकारों को झूठे मामलों में फंसाना लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत है। उनका कहना है कि अगर सच बोलने वालों को ही जेल भेजा जाएगा, तो गलत काम करने वालों के हौसले और बुलंद होंगे। पत्रकारों ने मांग की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जाए, ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषियों पर कार्रवाई हो सके।

इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। लोगों का कहना है कि पुलिस का काम निष्पक्ष जांच करना और कानून के आधार पर कार्रवाई करना होता है, लेकिन अगर पुलिस बिना पूरी जांच के कार्रवाई करती है तो इससे आम जनता का भरोसा कमजोर होता है। पत्रकारों का कहना है कि अगर पुलिस सच में कानून का पालन करना चाहती है तो उसे हर मामले में निष्पक्ष जांच करनी चाहिए और किसी के दबाव में आकर कार्रवाई नहीं करनी चाहिए।

कौशांबी में पत्रकारों की दबती आवाज अब एक बड़ा मुद्दा बनती जा रही है। पत्रकारों का कहना है कि वे डरने वाले नहीं हैं और सच सामने लाने के लिए संघर्ष जारी रखेंगे। उनका कहना है कि पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी है और वे इस जिम्मेदारी को हर हाल में निभाते रहेंगे। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन और पुलिस इस पूरे मामले में क्या रुख अपनाते हैं और क्या सच में पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्रता सुनिश्चित की जाती है या नहीं।

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