कच्चे तेल की खरीद को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच केंद्र सरकार ने संसदीय समिति के सामने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। सरकार ने दो टूक कहा है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए वहीं से तेल खरीदेगा, जहां उसे सबसे सस्ता और लाभकारी विकल्प मिलेगा। राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए सरकार ने संकेत दिया है कि वैश्विक दबावों से ऊपर देश की आर्थिक मजबूती को रखा जाएगा। सूत्रों के अनुसार, संसदीय समिति की बैठक में सदस्यों ने अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, प्रतिबंधों और वैश्विक तेल बाजार की अनिश्चितताओं के बीच भारत की खरीद नीति पर सवाल उठाए थे। इसके जवाब में सरकार ने कहा कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में किफायती दरों पर कच्चा तेल खरीदना आर्थिक स्थिरता के लिए बेहद जरूरी है। सरकार का कहना है कि यदि किसी देश से तेल रियायती दरों पर उपलब्ध होता है और भुगतान व आपूर्ति की शर्तें भारत के हित में हैं, तो उससे खरीद करना पूरी तरह व्यावसायिक और व्यावहारिक निर्णय है। यह किसी राजनीतिक रुख से प्रेरित नहीं, बल्कि बाजार आधारित रणनीति है। अधिकारियों ने समिति को बताया कि तेल खरीद के फैसले अंतरराष्ट्रीय बाजार दर, बीमा, परिवहन लागत और रिफाइनरी की तकनीकी अनुकूलता जैसे कई कारकों को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं। ऊर्जा मंत्रालय के प्रतिनिधियों ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत ने हमेशा विविध स्रोतों से तेल खरीदने की नीति अपनाई है। पश्चिम एशिया, अफ्रीका, अमेरिका और अन्य क्षेत्रों से आयात के जरिए आपूर्ति को संतुलित रखा जाता है ताकि किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता न हो। इससे आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में जोखिम कम होता है। सरकार ने समिति को यह भी बताया कि सस्ता तेल मिलने से घरेलू बाजार में महंगाई पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों का सीधा असर परिवहन लागत और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है। ऐसे में किफायती आयात आम उपभोक्ता और उद्योग दोनों के हित में है। बैठक में यह भी कहा गया कि भारत की विदेश नीति स्वतंत्र और संतुलित रही है। ऊर्जा खरीद को कूटनीतिक दबाव से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार का मानना है कि वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी दरों पर खरीद करना हर देश का अधिकार है, और भारत भी इसी सिद्धांत पर काम कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते भू-राजनीतिक माहौल में ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश के लिए रणनीतिक प्राथमिकता बन चुकी है। भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और बढ़ती ऊर्जा मांग को देखते हुए दीर्घकालिक और किफायती आपूर्ति सुनिश्चित करना जरूरी है। कुल मिलाकर, संसदीय समिति के समक्ष सरकार ने साफ कर दिया है कि तेल खरीद का निर्णय पूरी तरह राष्ट्रीय हित, आर्थिक गणना और ऊर्जा सुरक्षा के आधार पर लिया जाएगा। आने वाले समय में भी भारत की नीति यही रहेगी कि जहां बेहतर शर्तें और कम कीमत मिलेगी, वहीं से कच्चा तेल खरीदा जाएगा। Post navigation मुर्शिदाबाद में नई मस्जिद निर्माण की तैयारी, 1200 मौलवियों को आमंत्रण लोकसभा स्पीकर के साथ किया गाली गलौच, रिजिजू ने लगाए गंभीर आरोप