Epstein files india modi controversy

अमेरिका के प्रसिद्ध लेकिन विवादित वित्तीय और सामाजिक व्यक्तित्व, जेफ्री एपस्टीन का नाम पिछले कुछ वर्षों में कई अंतरराष्ट्रीय विवादों में उभरा है। एपस्टीन एक करोड़पति फाइनेंसर था, जो अपने पैसे और कनेक्शन के जरिए अमेरिकी और वैश्विक राजनीति, सेलिब्रिटी सर्कल और बिजनेस नेटवर्क का हिस्सा बन गया था। उसका जीवन भले ही दिखने में शानदार था, लेकिन पीछे का सच बेहद काला और घिनौना था।

एपस्टीन पर 2005 से लेकर 2019 तक कई गंभीर आरोप लगे, जिनमें नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण और मानव तस्करी शामिल हैं। 2019 में उसकी मृत्यु जेल में हुई, जिसे अमेरिका की आधिकारिक रिपोर्ट ने आत्महत्या बताया, लेकिन पोस्टमॉर्टम और अन्य फॉरेंसिक रिपोर्ट ने इसे हत्या का शक जताया।

इसके बाद, अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमेंट ने एपस्टीन के ई-मेल, चैट और फाइल्स सार्वजनिक कीं, जिन्हें अब “एपस्टीन फाइल्स” कहा जाता है। इन फाइल्स में कई नाम आए, जिनके बारे में दावा किया गया कि एपस्टीन उनसे संपर्क में था या उनसे सलाह लेता था। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम भी इन फाइल्स में आया, जिसे लेकर भारतीय राजनीति और मीडिया में बहस छिड़ गई।

जेफ्री एपस्टीन की विवादित जिंदगी

जेफ्री एपस्टीन का जन्म न्यूयॉर्क में हुआ और वह फाइनेंसर के तौर पर बहुत जल्दी अमीर और प्रभावशाली बन गया। उसकी संपत्ति, प्रतिष्ठित दोस्तों का नेटवर्क और हाई-सोसाइटी पार्टियों ने उसे अमेरिका के सबसे मशहूर लेकिन काले वित्तीय व्यक्तित्वों में शामिल कर दिया।

2005 में एपस्टीन पर पहली बार गंभीर आरोप लगे, जिसमें उसने नाबालिग लड़कियों से यौन उत्पीड़न करने का मामला शामिल था। 2008 में उसे दोषी ठहराया गया और सिर्फ 13 महीने की जेल हुई। इस जेल की सजा में वह अक्सर अपने सेल से बाहर था और सोशल सर्कल में घूमता रहा।

2019 में फिर से एपस्टीन को गिरफ्तार किया गया, इस बार नाबालिग लड़कियों के सेक्स ट्रैफिकिंग के गंभीर आरोपों में। जेल में उसकी मौत हुई और मीडिया रिपोर्ट ने इसे आत्महत्या बताया, लेकिन पोस्टमॉर्टम में गले की हड्डियों के टूटने की बात सामने आई, जिससे हत्या की संभावना जताई गई।

एपस्टीन फाइल्स: खुलासे और भारत का कनेक्शन

2026 में अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमेंट ने एपस्टीन से जुड़े कई ई-मेल, चैट और दस्तावेज़ सार्वजनिक किए। इन फाइल्स में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम भी आया।

फाइल्स के अनुसार, 2017 में मोदी के इजरायल दौरे से ठीक पहले एपस्टीन ने एक लेटर लिखा जिसमें दावा किया गया कि मोदी उससे किसी “सलाह” के लिए संपर्क में थे। कांग्रेस पार्टी ने इसे गंभीर मुद्दा बताते हुए केंद्र सरकार पर हमला किया। कांग्रेस के कई नेता सोशल मीडिया पर स्क्रीनशॉट शेयर करते रहे और सवाल उठाए कि मोदी ने एपस्टीन से क्या सलाह ली थी और इसका देश की छवि पर क्या असर होगा। इसके अलावा, फाइल्स में अनिल अंबानी का नाम भी आया। अंबानी ने एपस्टीन से अमेरिकी कनेक्शंस के जरिए मदद मांगी थी। विपक्षी नेताओं ने इसे भारत के लिए “राष्ट्रीय शर्म” कहा।

सरकार का जवाब

भारतीय सरकार ने स्पष्ट किया कि एपस्टीन फाइल्स में पीएम मोदी का नाम केवल आधिकारिक ई-मेल में आया है और यह “दोषी की मनगढ़ंत बातें” हैं। विदेश मंत्रालय ने कहा कि इसमें कोई सच्चाई नहीं है और इसे भारत की छवि को बदनाम करने की कोशिश माना जा सकता है। सरकार ने यह भी बताया कि इन फाइल्स के आधार पर भारतीय अदालत में कोई कानूनी कार्रवाई संभव नहीं है क्योंकि फाइल्स में उपलब्ध सबूत 65B सर्टिफिकेट के बिना हैं।

कांग्रेस का सवाल

कांग्रेस ने इस मामले को गंभीर बताते हुए कई सवाल उठाए, जैसे:
मोदी ने 2019 के चुनावों के आसपास एपस्टीन से क्यों संपर्क किया?
अमेरिका में इस दोस्ती के बारे में जनता को क्यों नहीं बताया गया?
गलवान विवाद के बाद चीन को क्लीन चिट क्यों दी गई?
स्टीव बैनन और मोदी के बीच कौन सी मीटिंग हुई और क्या चर्चा हुई?

कांग्रेस नेताओं का कहना था कि एपस्टीन की फाइल्स में मोदी का नाम भारत के लिए शर्मनाक साबित हो सकता है।

सोशल मीडिया और जनता की प्रतिक्रिया

एपस्टीन फाइल्स ने सोशल मीडिया पर भी तूफान मचा दिया। कई यूज़र्स ने वीडियो, ट्वीट और पोस्ट के जरिए मोदी और एपस्टीन के संबंध को लेकर अपनी राय दी। वहीं, कुछ लोग इसे राजनीतिक चाल बताते हुए फाइल्स को गंभीरता से नहीं ले रहे थे। कई विशेषज्ञों ने कहा कि फाइल्स में शामिल सभी जानकारी की सत्यता जांचना बेहद जरूरी है, क्योंकि इसमें फर्जी और मनगढ़ंत बातें भी शामिल हो सकती हैं। एपस्टीन फाइल्स में भारत के प्रधानमंत्री का नाम आने के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी चर्चा हुई। अमेरिका और यूरोप के कुछ प्लेटफॉर्म्स ने इसे भारत की राजनीति और सुरक्षा पर सवाल उठाने वाला मामला बताया। विशेषज्ञों का मानना है कि एपस्टीन की फाइल्स का उद्देश्य सिर्फ व्यक्तिगत छवि को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि राजनीतिक ब्लैकमेल और प्रभाव बनाने का भी हो सकता है।

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