अमेठी ब्यूरो, नितेश तिवारी उत्तर प्रदेश के अमेठी के मुसाफिरखाना विकासखंड क्षेत्र में स्कूल समायोजन को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। ग्रामीणों और अभिभावकों का आरोप है कि शिक्षा विभाग की लापरवाही के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। मामला प्राथमिक विद्यालय पूरे शिवदयाल, ग्राम दादरा से जुड़ा है, जिसे प्रशासनिक आदेश के तहत प्राथमिक विद्यालय पूरे पहलवान में समायोजित कर दिया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि कागजों में दोनों विद्यालयों के बीच दूरी लगभग 800 मीटर दिखाई गई है, जबकि वास्तविक जमीनी दूरी 2 किलोमीटर से अधिक है। अभिभावकों का आरोप है कि इतनी लंबी दूरी छोटे बच्चों के लिए तय करना संभव नहीं है। परिणामस्वरूप कई बच्चों ने स्कूल जाना ही बंद कर दिया है, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है। अभिभावकों बसीर उल निशा और हिना बानो ने बताया कि प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए इतनी दूरी तय करना बहुत मुश्किल है। उन्होंने चिंता जताई कि छोटे बच्चे सुरक्षित तरीके से स्कूल कैसे पहुंच पाएंगे। बच्चों खुशनूर बानो, फिजा, मोहम्मद इकबाल, दौलत अली और रहमान अली ने भी कहा कि स्कूल दूर होने के कारण वे नियमित रूप से पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि विद्यालय समायोजन के दौरान जमीनी वास्तविकता का सही आकलन नहीं किया गया। ग्राम प्रधान प्रतिनिधि दादरा संदीप सिंह उर्फ सोनू ने इस मामले में उच्च अधिकारियों को लिखित शिकायत भेजी है। उनका कहना है कि विद्यालय के प्रधानाचार्य अनिरुद्ध द्वारा गलत रिपोर्ट तैयार कर अधिकारियों को गुमराह किया गया और वास्तविक दूरी को कम दिखाया गया। प्रधान प्रतिनिधि ने मांग की है कि प्राथमिक विद्यालय पूरे शिवदयाल को पुनः संचालित किया जाए ताकि बच्चों की शिक्षा प्रभावित न हो। उनका कहना है कि शासन के निर्देशों के अनुसार विद्यालयों का समायोजन एक किलोमीटर की परिधि के अंदर होना चाहिए, लेकिन इस मामले में नियमों का पालन नहीं किया गया। वहीं खंड शिक्षा अधिकारी Satish Singh ने स्पष्ट किया कि दूरी विद्यालय से नहीं बल्कि मजरे के आधार पर मापी गई है। उन्होंने बताया कि पूरे शिवदयाल गांव में छात्र संख्या 30 से कम होने के कारण समायोजन किया गया है और सभी बच्चों का नामांकन नजदीकी विद्यालय में कर दिया गया है। इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या कागजी रिपोर्ट के आधार पर बच्चों के भविष्य से समझौता किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर प्रशासनिक स्तर पर निर्णय लेना उचित नहीं है। स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन से मामले की निष्पक्ष जांच कराने और विद्यालय को पुनः संचालित करने की मांग की है। उनका कहना है कि प्राथमिक शिक्षा बच्चों का अधिकार है और इसे सुनिश्चित करने के लिए समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए। अब सभी की नजरें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हुई हैं। Post navigation सांसद के तेवर से हिली ‘दिशा’ बैठक, जवाब न दे सके अधिकारी; डिप्टी सीएम पर भी साधा निशाना होली पर शुद्धता का अभियान, मिलावट माफिया के खिलाफ प्रशासन की बड़ी ‘सर्जिकल स्ट्राइक