ज़रा कल्पना कीजिए अगर अचानक दुनिया की अर्थव्यवस्था डगमगाने लगे, जहाज़ों की आवाजाही रुक जाए, पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छूने लगें और हर देश में बेचैनी फैल जाए। ऐसा सीन हमें अक्सर तब देखने को मिलता है जब मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ता है। United States, Israel और Iran जैसे देशों के बीच टकराव सिर्फ इन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला देता है। इसकी सबसे बड़ी वजह है क्रूड ऑयल. लेकिन सवाल ये है कि आखिर ये तेल इतना अहम कैसे बन गया? और मिडिल ईस्ट दुनिया का सबसे बड़ा तेल केंद्र कैसे बना? इसकी कहानी लाखों साल पुरानी है। बहुत पहले का समय था, जब इंसान के पास रोशनी के सीमित साधन थे। रात का मतलब अंधेरा होता था। अमीर घरों में ही दीपक जलते थे, जबकि आम लोग अंधेरे में जीवन जीते थे। धीरे-धीरे इंसान ने नए विकल्प तलाशने शुरू किए। इतिहास बताता है कि करीब 347 ईस्वी में China में पहली बार तेल के कुएं खोदे गए थे, लेकिन उस समय इसका उपयोग बहुत सीमित था। उस दौर में रोशनी के लिए व्हेल मछलियों के तेल का इस्तेमाल होता था, जो बेहद महंगा और कठिन था। इसी तलाश ने केरोसिन की खोज को जन्म दिया। जैसे ही केरोसिन आया, दुनिया बदल गई। अब आम लोग भी अपने घरों में रोशनी कर सकते थे और व्हेल मछलियों का शिकार भी कम हो गया। अगर क्रूड ऑयल की बात करें, तो यह सिर्फ एक काला तरल नहीं, बल्कि प्रकृति की करोड़ों साल पुरानी प्रक्रिया का परिणाम है। समुद्र में रहने वाले सूक्ष्म जीव और पौधे लाखों साल पहले मरकर समुद्र की गहराइयों में दब गए। समय के साथ उन पर मिट्टी और चट्टानों की परतें चढ़ती गईं। दबाव और तापमान ने इन्हें बदलकर तेल और गैस में बदल दिया यही आज का क्रूड ऑयल है। इतिहास में इसके शुरुआती उपयोग भी रोचक हैं। लगभग 5000 साल पहले Egypt में इसका इस्तेमाल ममी के ताबूतों को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता था। उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि यही पदार्थ आगे चलकर दुनिया की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन जाएगा। तेल की असली क्रांति 19वीं सदी में आई। 1846 में कनाडा के वैज्ञानिक Abraham Gesner ने केरोसिन बनाने का तरीका खोजा। इसके बाद 1859 में United States में Edwin Drake ने जमीन के नीचे से पहली बार तेल निकाला। यह घटना ऐतिहासिक साबित हुई। तेल इतनी तेजी से निकला कि फव्वारे की तरह ऊपर उछल पड़ा। इसके बाद दुनिया में पेट्रोल और मशीनों का दौर शुरू हुआ। 1885 में Karl Benz ने पहली पेट्रोल कार बनाई, और 1908 में Henry Ford ने सस्ती कार बनाकर इसे आम लोगों तक पहुंचा दिया। इसके साथ ही तेल की मांग तेजी से बढ़ने लगी और दुनिया इसकी आदी हो गई। अब आते हैं मिडिल ईस्ट पर, जहां से असली खेल शुरू होता है। 20वीं सदी की शुरुआत में जब तेल की मांग बढ़ी, तो कंपनियां नए स्रोत खोजने लगीं। 1908 में Iran के मस्जिद-ए-सुलेमान में बड़े पैमाने पर तेल मिला। यह खोज ब्रिटिश कंपनी ने की थी और यहीं से मिडिल ईस्ट की किस्मत बदल गई। इसके बाद Saudi Arabia, Iraq और Kuwait जैसे देशों में विशाल तेल भंडार मिले। धीरे-धीरे यह पूरा क्षेत्र दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक बन गया। आज दुनिया की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा यहीं से आता है। यही वजह है कि जब भी मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ता है, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। तेल की सप्लाई प्रभावित होती है, शिपिंग रूट्स बाधित होते हैं और पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ जाते हैं। इसीलिए मिडिल ईस्ट को दुनिया की “एनर्जी लाइफलाइन” कहा जाता है क्योंकि यहां की हलचल पूरी दुनिया की रफ्तार तय करती है। Post navigation Russia India Relationship: दोस्त रूस भारत को दे रहा झटके पर झटका, किसानों पर मंडराया संकट