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रूस और भारत के बीच लंबे समय से मजबूत रणनीतिक और आर्थिक संबंध रहे हैं, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने इन रिश्तों में नई चिंता पैदा कर दी है। पहले सस्ते कच्चे तेल पर मिलने वाली छूट में कमी और अब खाद (फर्टिलाइज़र) के निर्यात पर रोक इन दोनों फैसलों ने भारत के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। ताजा घटनाक्रम में Russia ने भारत को खाद का निर्यात निलंबित कर दिया है, जिसका सीधा असर भारत की कृषि व्यवस्था पर पड़ सकता है। रूस ने साफ तौर पर कहा है कि उसके यहां घरेलू मांग तेजी से बढ़ रही है, जिसके चलते वह फिलहाल अन्य देशों को खाद निर्यात करने की स्थिति में नहीं है। यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब भारत पहले से ही वैश्विक सप्लाई चेन के उतार-चढ़ाव का सामना कर रहा है। रूस भारत के लिए सबसे बड़े खाद आपूर्तिकर्ताओं में से एक रहा है, खासकर यूरिया और पोटाश जैसे उर्वरकों के मामले में।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए खाद की उपलब्धता बेहद अहम है। देश की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है और हर सीजन में उर्वरकों की मांग काफी ज्यादा होती है। ऐसे में रूस की ओर से सप्लाई रुकने का मतलब है कि आने वाले समय में किसानों को खाद की कमी का सामना करना पड़ सकता है। इसका असर न सिर्फ फसल उत्पादन पर पड़ेगा, बल्कि खाद्य सुरक्षा और महंगाई पर भी दिख सकता है। इससे पहले रूस ने भारत को मिलने वाली सस्ते कच्चे तेल की छूट में भी कटौती की थी। India ने यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से भारी मात्रा में सस्ता तेल खरीदकर अपने ऊर्जा खर्च को संतुलित किया था। लेकिन अब धीरे-धीरे उस छूट में कमी आ रही है, जिससे भारत के लिए आयात महंगा होता जा रहा है। ऐसे में खाद निर्यात पर रोक को एक और “झटका” माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि रूस का यह कदम पूरी तरह से उसकी घरेलू प्राथमिकताओं से जुड़ा है। वैश्विक स्तर पर खाद की कीमतें पहले ही अस्थिर बनी हुई हैं, और कई देशों ने अपने-अपने स्तर पर निर्यात नियंत्रण लगाए हैं ताकि घरेलू बाजार में कीमतों को काबू में रखा जा सके। रूस भी इसी रणनीति के तहत अपने किसानों और कृषि क्षेत्र को प्राथमिकता दे रहा है। भारत सरकार के सामने अब चुनौती यह है कि वह इस संभावित संकट से कैसे निपटे। सरकार के पास कुछ विकल्प मौजूद हैं जैसे अन्य देशों से खाद आयात बढ़ाना, घरेलू उत्पादन को तेज करना और किसानों को वैकल्पिक उर्वरकों के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करना। हालांकि, इन उपायों को लागू करने में समय लगेगा और तत्काल प्रभाव से स्थिति को संभालना आसान नहीं होगा।

इसके अलावा, भारत को अपनी दीर्घकालिक रणनीति पर भी ध्यान देना होगा। एक या दो देशों पर अत्यधिक निर्भरता हमेशा जोखिम भरी होती है। रूस के साथ संबंध मजबूत होने के बावजूद, इस तरह के फैसले यह दिखाते हैं कि वैश्विक राजनीति और आर्थिक प्राथमिकताएं कभी भी बदल सकती हैं। ऐसे में भारत को सप्लाई स्रोतों में विविधता लाने और आत्मनिर्भरता बढ़ाने की दिशा में तेजी से काम करना होगा। किसानों के स्तर पर भी इस फैसले का असर देखने को मिल सकता है। अगर खाद की कीमतें बढ़ती हैं या उपलब्धता घटती है, तो खेती की लागत बढ़ेगी। इससे छोटे और सीमांत किसानों पर सबसे ज्यादा दबाव पड़ेगा। सरकार को सब्सिडी और वितरण व्यवस्था को मजबूत करना होगा ताकि किसानों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। कुल मिलाकर, रूस का खाद निर्यात रोकने का फैसला भारत के लिए एक चेतावनी की तरह है। यह दिखाता है कि वैश्विक आपूर्ति पर निर्भरता कितनी संवेदनशील हो सकती है। अब यह देखना अहम होगा कि भारत इस चुनौती का सामना किस तरह करता है और अपने कृषि तथा आर्थिक हितों को सुरक्षित रखने के लिए क्या कदम उठाता है।

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