मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध ने दुनिया की भू-राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है। जहां एक ओर Strait of Hormuz जैसे अहम समुद्री रास्तों पर तनाव बढ़ा हुआ है, वहीं दूसरी ओर चीन अब एक नई रणनीति के तहत भारत के पड़ोस में अपनी पकड़ मजबूत करने की तैयारी में जुट गया है। चीन की यह चाल केवल एक आर्थिक परियोजना नहीं, बल्कि एक बड़ा सामरिक दांव मानी जा रही है, जो आने वाले समय में हिंद महासागर को नए ‘जंग के मैदान’ में बदल सकती है। दरअसल, चीन बंगाल की खाड़ी के रास्ते म्यांमार को जोड़ते हुए एक नए आर्थिक गलियारे (Economic Corridor) को विकसित करने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। यह प्रोजेक्ट Myanmar के तटीय क्षेत्रों से होते हुए सीधे चीन के युन्नान प्रांत तक पहुंचेगा। इस गलियारे का उद्देश्य केवल व्यापार को बढ़ाना नहीं है, बल्कि चीन को ऊर्जा आपूर्ति के लिए एक वैकल्पिक और सुरक्षित मार्ग देना भी है। अभी तक चीन की ऊर्जा सप्लाई काफी हद तक मिडिल ईस्ट और होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर रही है। लेकिन वहां बढ़ते संघर्ष और अस्थिरता ने चीन की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे में वह म्यांमार के जरिए हिंद महासागर तक सीधी पहुंच बनाकर अपने लिए एक ‘बैकअप रूट’ तैयार करना चाहता है। यही वजह है कि इस परियोजना को कई विशेषज्ञ ‘चीन का नया ईरान मॉडल’ भी कह रहे हैं जहां वह एक ऐसे रणनीतिक साझेदार को विकसित कर रहा है, जो संकट के समय उसके लिए जीवनरेखा साबित हो सके। भारत के लिए यह स्थिति चिंता का विषय बन सकती है। क्योंकि Bay of Bengal और हिंद महासागर क्षेत्र भारत की सामरिक और आर्थिक सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं। अगर चीन म्यांमार में अपनी मौजूदगी को और मजबूत करता है, तो यह भारत के समुद्री प्रभाव (Maritime Influence) को सीधी चुनौती दे सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की यह रणनीति केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। इसके पीछे उसका ‘String of Pearls’ मॉडल भी काम कर रहा है, जिसके तहत वह हिंद महासागर के आसपास के देशों में बंदरगाह और इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित कर अपनी सैन्य और आर्थिक पहुंच बढ़ा रहा है। म्यांमार का क्यौकफ्यू (Kyaukphyu) पोर्ट इस रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है, जहां चीन पहले से ही निवेश कर चुका है। इस पूरे घटनाक्रम का एक और बड़ा पहलू यह है कि अगर मिडिल ईस्ट में युद्ध और गहराता है, तो वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर असर और बढ़ेगा। ऐसे में चीन जैसे देश वैकल्पिक मार्गों को और तेजी से विकसित करेंगे। लेकिन इसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा, क्योंकि हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी भारत की सुरक्षा रणनीति को चुनौती दे सकती है। भारत पहले से ही इस स्थिति को लेकर सतर्क है। वह अपनी ‘Act East Policy’ और इंडो-पैसिफिक रणनीति के तहत क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने में जुटा है। साथ ही, भारतीय नौसेना भी हिंद महासागर में अपनी मौजूदगी को लगातार बढ़ा रही है, ताकि किसी भी संभावित खतरे का समय रहते जवाब दिया जा सके। कुल मिलाकर, चीन का यह नया आर्थिक गलियारा केवल एक विकास परियोजना नहीं, बल्कि एक बड़ा भू-राजनीतिक संकेत है। यह संकेत देता है कि आने वाले समय में संघर्ष केवल जमीन पर नहीं, बल्कि समुद्र के रास्तों पर भी होगा। सवाल यह है कि क्या हिंद महासागर भी मिडिल ईस्ट की तरह तनाव का केंद्र बन जाएगा? और अगर ऐसा हुआ, तो क्या भारत इस चुनौती का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है? Post navigation Trump का टैरिफ भी फेल? अमेरिका पर बढ़ता कर्ज और 900 अरब डॉलर का ब्याज बोझ मिडिल ईस्ट तनाव पर भारतीय दांव: ईरान युद्ध थमने का इंतजार, घटाई खरीद, सस्ते तेल की उम्मीद