अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है और अब यह 94 के पार पहुंच गया है। इस गिरावट ने राजनीतिक बहस को भी तेज कर दिया है। विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने इस मुद्दे को उठाते हुए केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री Narendra Modi पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस का कहना है कि 2014 में जब मोदी सरकार ने सत्ता संभाली थी, तब रुपया लगभग 56 के स्तर पर था। लेकिन अब यह 94 के पार पहुंच चुका है, जो देश की अर्थव्यवस्था की कमजोरी और नीतिगत विफलता को दर्शाता है। पार्टी ने तंज कसते हुए कहा कि “शतक लगाने का इरादा तो नहीं था”, लेकिन रुपया तेजी से शतक की ओर बढ़ रहा है। रुपये की इस गिरावट के पीछे कई आर्थिक और वैश्विक कारण बताए जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की मजबूती, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता जैसे कारक भारतीय मुद्रा पर दबाव डाल रहे हैं। भारत एक आयात-निर्भर देश है, जहां पेट्रोल-डीजल जैसे उत्पादों का बड़ा हिस्सा बाहर से आता है। ऐसे में डॉलर मजबूत होने पर आयात महंगा हो जाता है, जिसका सीधा असर रुपये की वैल्यू पर पड़ता है। इसके अलावा, विदेशी निवेश में कमी और बाजार में अस्थिरता भी रुपये की कमजोरी का कारण बन रही है। जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालते हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है। #WATCH | Noida, UP: Congress leader Supriya Shrinate says, "…No previous Prime Minister has set the kind of record that PM Modi has. He has pushed the Rupee past the 94 mark. Today, the value of the Rupee stands at over 94 against the Dollar. The reality is that PM Modi… pic.twitter.com/UGOdFRcdoC— ANI (@ANI) March 22, 2026 विपक्ष का आरोप है कि सरकार की आर्थिक नीतियां इस गिरावट को रोकने में सफल नहीं रही हैं। कांग्रेस का कहना है कि मजबूत अर्थव्यवस्था के दावों के बावजूद रुपये का लगातार गिरना देश की आर्थिक स्थिति पर सवाल खड़े करता है। हालांकि, आर्थिक विशेषज्ञ इस मामले को अलग नजरिए से देखते हैं। उनका मानना है कि केवल मुद्रा के मूल्य के आधार पर अर्थव्यवस्था की स्थिति को पूरी तरह नहीं आंका जा सकता। भारत की अर्थव्यवस्था इस समय दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, और इसका जीडीपी ग्रोथ मजबूत बना हुआ है। विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि रुपये की गिरावट का एक पहलू निर्यात को भी फायदा पहुंचाता है। जब रुपया कमजोर होता है, तो भारतीय वस्तुएं अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ती हो जाती हैं, जिससे निर्यात बढ़ सकता है। हालांकि, इसका नकारात्मक प्रभाव आयात महंगा होने के रूप में सामने आता है। इस पूरे मुद्दे ने राजनीतिक तापमान भी बढ़ा दिया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे सरकार की नाकामी के रूप में पेश कर रहे हैं, जबकि सरकार की ओर से अक्सर यह कहा जाता है कि वैश्विक परिस्थितियों और आर्थिक चुनौतियों के बीच भारत की स्थिति अन्य देशों की तुलना में काफी बेहतर है। कुल मिलाकर, डॉलर के मुकाबले रुपये का 94 के पार पहुंचना न सिर्फ आर्थिक चिंता का विषय है, बल्कि यह राजनीतिक बहस का भी केंद्र बन गया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस स्थिति को स्थिर करने के लिए क्या कदम उठाती है और रुपये की मजबूती को कैसे वापस लाती है। Post navigation LPG Black Marketing: सिलेंडर ब्लैक में 6000 तक, लोगों को लगानी पड़ रही लंबी लाइन Weather Alert: 20 राज्यों में बदलेगा मौसम, आंधी-तूफान और ओले गिरने की चेतावनी