ईरान और वैश्विक राजनीति के बीच जारी तनाव को समझने के लिए सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि उसके भीतर मौजूद ताकतवर संस्थानों और विचारधारा को भी देखना जरूरी है। इन्हीं में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है Islamic Revolutionary Guard Corps यानी IRGC, जिसे अक्सर ईरान की “शक्ति का केंद्र” माना जाता है। सवाल उठता है कि आखिर ईरान इतने दबावों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद भी पीछे हटने या हार मानने को तैयार क्यों नहीं है. इसका सबसे बड़ा कारण उसकी राजनीतिक और सैन्य संरचना है। IRGC केवल एक सैन्य बल नहीं है, बल्कि यह ईरान की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा का एक मजबूत स्तंभ है। इसकी स्थापना 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद की गई थी, जिसका उद्देश्य था देश की क्रांति और इस्लामिक शासन की रक्षा करना। समय के साथ यह संगठन केवल एक रक्षा बल नहीं रह गया, बल्कि ईरान की अर्थव्यवस्था और राजनीति में भी इसकी गहरी पैठ हो गई है।

IRGC के पास अपनी जमीनी सेना है, जो सामान्य सेना से अलग काम करती है। इसमें बख्तरबंद यूनिट, मशीनी पैदल सेना, तोपखाना और विशेष ऑपरेशन यूनिट शामिल हैं। इसका काम न केवल बाहरी खतरों से निपटना है, बल्कि देश के अंदर किसी भी तरह की अस्थिरता या विरोध को नियंत्रित करना भी है। यही कारण है कि ईरान के अंदर सरकार के खिलाफ उठने वाली आवाजों को तेजी से दबा दिया जाता है। इसके अलावा, IRGC की ताकत सिर्फ सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इसका आर्थिक साम्राज्य भी काफी विशाल माना जाता है। निर्माण, ऊर्जा, तेल, गैस, और इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे कई बड़े क्षेत्रों में इसकी पकड़ है। इस वजह से IRGC के पास न केवल सैन्य शक्ति है, बल्कि आर्थिक संसाधनों की भी कोई कमी नहीं है। यही आर्थिक मजबूती उसे लंबे समय तक संघर्ष करने की क्षमता देती है।

ईरान की कट्टर और मजबूत विचारधारा भी इस स्थिति में एक अहम भूमिका निभाती है। देश की राजनीतिक व्यवस्था इस्लामिक सिद्धांतों पर आधारित है, और वहां के नेतृत्व का मानना है कि वे केवल अपने देश की नहीं, बल्कि पूरे मुस्लिम जगत की रक्षा कर रहे हैं। इस विचारधारा के कारण जनता के एक बड़े हिस्से में सरकार के प्रति समर्थन बना रहता है, खासकर उन लोगों में जो इस्लामिक पहचान और आत्मनिर्भरता को महत्व देते हैं। एक और बड़ा कारण है ईरान का रणनीतिक धैर्य। ईरान सीधे युद्ध में उलझने के बजाय अक्सर “प्रॉक्सी वॉर” यानी अप्रत्यक्ष युद्ध की रणनीति अपनाता है। वह अपने समर्थित समूहों के जरिए क्षेत्र में प्रभाव बनाए रखता है, जिससे उसे सीधे नुकसान भी कम होता है और वह अपनी ताकत को लंबे समय तक बनाए रख सकता है।

इसके साथ ही, ईरान वर्षों से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। इन प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था को प्रभावित जरूर किया है, लेकिन साथ ही उसने आत्मनिर्भर बनने की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं। यही वजह है कि वह पूरी तरह से बाहरी दुनिया पर निर्भर नहीं है और अपने दम पर आगे बढ़ने की कोशिश करता है। कुल मिलाकर, ईरान का हार न मानना केवल सैन्य ताकत का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक जटिल मिश्रण है—मजबूत सैन्य ढांचा, गहरी विचारधारा, आर्थिक पकड़ और रणनीतिक धैर्य। IRGC जैसी संस्थाएं इस पूरे सिस्टम की रीढ़ हैं, जो ईरान को न केवल अपने देश के भीतर मजबूत बनाती हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उसे एक प्रभावशाली खिलाड़ी के रूप में बनाए रखती हैं।

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