ब्यूरो यूपी, नितिन अग्रहरि कौशाम्बी के महेवा घाट से एक GPS वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें यमुना की बहती धारा के बीच पोकलैंड मशीन से कथित तौर पर अवैध खनन होता दिख रहा है। अगर यह वीडियो सही है, तो यह सिर्फ़ रेत निकासी का मामला नहीं, यह सीधे-सीधे पर्यावरणीय नियमों, अदालतों के आदेशों और प्रशासनिक जवाबदेही को चुनौती है। याद रहे, नदी तल से खनन पर कड़े दिशा-निर्देश National Green Tribunal (NGT) और Supreme Court of India समय-समय पर जारी कर चुके हैं। नियम साफ़ कहते हैं कि बहती धारा के भीतर भारी मशीनों से खनन पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा है, यह नदी के प्राकृतिक प्रवाह, जलीय जीवन और तटबंधों की स्थिरता पर सीधा असर डालता है। यमुना जैसी जीवनदायिनी नदी के भीतर पोकलैंड चलना मामूली बात नहीं। यह संकेत है कि या तो नियमों की खुलेआम अनदेखी हो रही है, या फिर जिम्मेदार विभागों की निगरानी व्यवस्था फेल हो चुकी है। अवैध खनन का सीधा असर भूजल स्तर, किसानों की सिंचाई और आसपास के गाँवों की सुरक्षा पर पड़ता है। बरसात में यही छेड़छाड़ कटान और बाढ़ का जोखिम बढ़ाती है। प्रशासन की चुप्पी क्यों? जिला खनन अधिकारी, तहसील प्रशासन और स्थानीय पुलिस, तीनों की जिम्मेदारी बनती है कि वे तुरंत संयुक्त जांच करें। अगर वीडियो फर्जी है तो साफ़-साफ़ खंडन सामने आए, और अगर असली है, तो मशीन जब्त हो, संबंधित ठेकेदार/पट्टाधारक पर मुकदमा दर्ज हो, और जिन अधिकारियों की लापरवाही सामने आए, उन पर विभागीय कार्रवाई हो। यह भी जरूरी है कि खनन की पूरी अनुमति, पर्यावरणीय मंज़ूरी और सीमांकन (डिमार्केशन) की जानकारी सार्वजनिक की जाए। पारदर्शिता ही भरोसा लौटाती है। वरना सवाल उठेंगे कि क्या अवैध खनन के पीछे संरक्षण की छाया है? क्या महेवा घाट की बहती धारा में पोकलैंड चलना नियमों की खुली अवहेलना नहीं है?क्या National Green Tribunal के निर्देश सिर्फ़ कागज़ों तक सीमित हैं?क्या खनन पट्टा बहती धारा के भीतर तक दिया गया है, या सीमाओं को जानबूझकर लांघा गया?क्या स्थानीय पुलिस को यह सब दिखाई नहीं देता, या देखने से बचा जा रहा है?क्या जिला खनन अधिकारी ने हाल में कोई स्थलीय निरीक्षण किया था?क्या GPS वीडियो की लोकेशन की पुष्टि प्रशासन ने कर ली है?क्या मशीनें बिना मिलीभगत के नदी के बीच तक पहुँच सकती हैं?क्या पर्यावरणीय मंज़ूरी की शर्तों का पालन हो रहा है?क्या राजस्व और खनन विभाग के रिकॉर्ड वास्तविक स्थिति से मेल खाते हैं?क्या नदी के कटान और बाढ़ के खतरे की जिम्मेदारी कौन लेगा?क्या दोषी पाए जाने पर सिर्फ़ मजदूरों पर कार्रवाई होगी या असली संचालकों पर भी?क्या संबंधित ठेकेदारों के खिलाफ़ एफआईआर दर्ज होगी?क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?क्या जनता को जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी?क्या यमुना की धारा को मशीनों से खोदने की इजाज़त किसी ने दी है?और सबसे बड़ा सवाल, कौशाम्बी में कानून का राज है या रेत माफिया का? Post navigation नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बाद यूपी के कई अन्य बड़े नेता भी साइकिल पर हुए सवार कर्जमाफी, MSP कानून और ₹5000 पेंशन की मांग को लेकर राष्ट्रपति के नाम सौंपा ज्ञापन