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मैं कौशांबी बोल रहा हूं…
हाँ, वही कौशांबी, जिसे 4 अप्रैल 1997 को इलाहाबाद से अलग कर एक नया जिला बनाया गया था। आज इलाहाबाद को आप प्रयागराज कहते हैं, लेकिन मेरी पहचान आज भी अधूरी है। जन्म के दिन से अब तक मैं बड़ा तो हुआ, पर पहचाना नहीं गया।

जब मैंने आंखें खोलीं, तो लोगों ने कहा. “अब कौशांबी बदलेगा, अब यहां विकास आएगा।” उम्मीदों की मिठाई बांटी गई, सपनों के पोस्टर लगाए गए। कहा गया कि अब सड़कें होंगी, कॉलेज होंगे, अस्पताल होंगे, रोजगार होगा। मेरे बच्चे बाहर नहीं जाएंगे, यहीं पढ़ेंगे, यहीं कमाएंगे।
लेकिन साल बीतते गए… सरकारें बदलीं… चेहरे बदले… नारे बदले… पर मेरी किस्मत नहीं बदली।

आज भी जब मेरा नाम लिया जाता है, तो बड़े शहरों में लोग पूछते हैं.
“कौशांबी? गाजियाबाद वाला?”
और फिर मेरे लोग थककर बताते हैं.
“नहीं भाई, प्रयागराज के पास वाला कौशांबी।”

यहीं मेरी सबसे बड़ी पीड़ा छुपी है—मैं जिला हूं, लेकिन पहचान नहीं हूं।

मेरे गर्भ से नेता निकले

मेरी मिट्टी ने नेताओं को जन्म दिया। कोई छात्र राजनीति से उठा, कोई आंदोलन से, कोई जाति के सहारे, कोई सत्ता की सीढ़ी से। कोई विधायक बना, कोई मंत्री के करीब पहुंचा, कोई दिल्ली तक गया।
पर जब-जब कुर्सी मिली, मुझे भूल गए।

मेरे नाम पर भाषण हुए, मेरे नाम पर वोट मांगे गए, मेरे नाम पर झंडे लगे। लेकिन मेरे गांवों में आज भी कच्ची सड़कें हैं, स्कूलों में मास्टर नहीं हैं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं।
नेता आए, भाषण दिए और चले गए.
और पीछे छोड़ गए मैं, वही पुराना कौशांबी।

मैं खेत हूं, लेकिन किसान कर्ज में है

मेरी जमीन उपजाऊ है। गंगा-यमुना की गोद में पला हूं। धान, गेहूं, अरहर—सब देता हूं।
लेकिन मेरा किसान आज भी साहूकार के आगे झुका है। MSP कागजों में है, मंडी में नहीं।
यहां नेता खेती की राजनीति करते हैं, पर किसान की जिंदगी नहीं बदलते।

मेरे बच्चे बाहर पलायन करते हैं

मेरे बच्चे होशियार हैं। कोई IAS बनने का सपना देखता है, कोई इंजीनियर, कोई फौजी।
लेकिन पढ़ाई के लिए उन्हें इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ भागना पड़ता है।
यहां डिग्री है, लेकिन गुणवत्ता नहीं।
यहां सपने हैं, लेकिन रास्ते नहीं।

सिस्टम मुझे दीमक की तरह खा रहा है

मैं यह भी जानता हूं कि मुझे बाहर से नहीं, अंदर से खाया जा रहा है।
नेता, अफसर, ठेकेदार, तीनों मिलकर।
जैसे दीमक लकड़ी को धीरे-धीरे खोखला कर देती है, वैसे ही मुझे खोखला किया जा रहा है।

विकास की फाइलें बनती हैं, बजट आता है, लेकिन जमीन पर वही गड्ढे, वही अंधेरा, वही बेरोजगारी।
मेरे नाम पर योजनाएं आती हैं, लेकिन लाभ किसी और का होता है।

फिर भी मैं उम्मीद नहीं छोड़ता

मैं कौशांबी हूं।
मैं इतिहास भी हूं, सम्राट अशोक की धरती।
मैं वर्तमान भी हूं, संघर्ष करता जिला।
और मैं भविष्य भी हो सकता हूं, अगर मुझे सिर्फ वोट बैंक नहीं, इंसान समझा जाए।

मुझे किसी चमत्कार की जरूरत नहीं,
बस ईमानदार नीयत चाहिए।
मुझे किसी बड़े वादे की जरूरत नहीं,
बस सच्चा काम चाहिए।

मैं आज भी इंतजार में हूं
कि कोई मुझे सिर्फ “प्रयागराज के पास वाला जिला” नहीं,
कौशांबी कहकर पहचाने।

मैं कौशांबी बोल रहा हूं…
और अभी भी जिंदा हूं।

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